दिल-ऐ-थकन-4



आँखों का था क़ुसूर न दिल का क़ुसूर था

आयी जो मेरे सामने वो मेरा सुकून था!


वो थी न मुझसे दूर न मैं उससे दूर था

आती नहीं थी नज़र, तो नज़र का क़ुसूर था!


मुझमे तो दर्दमंदे-दिले-सुकून था

माना कि तुम न थी, कोई तुम-सा ज़रूर था!


लगते ही ठेस टूट गया सारे आरज़ू

मिलते ही धोखा, शीशा-ए-दिल चूर-चूर था!


ऐसा कहाँ रहता है दिसम्बर मे ज्यादा गर्मियों का जोश,

शामिल तुम्हारी ज़ेहन मे  बेवफाई का तमन्ना ज़रूर था!


एज़ाज़ के प्यार का क्यों  लिया गया इम्तिहान,

मुझमे क्या कसूर था  मुझे क्या सुकून था!


एज़ाज़ जिस दिल को तुमने शौक से अपना बना लिया,

उस दिल में इक छुपा हुआ दरार ज़रूर था!


देखा था कल अपने  ‘जिगर’ को सरे-राहे-मैदान मे,

इस कदर सिगरेट फूँक लिया था की नश्शे में चूर था!



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