गूगल मे मेरे अल्फाज़ो के मायने ढूंढती हैं,
नादान है वो लड़की, गुज़रे हुए ज़माने ढूँढती हैं,
कहती है जब एज़ाज़ था तो तलाशे-ज़िंदगी भी थी,
अब तो ज़िन्दगी जीने के ठिकाने ढूँढती हैं,
कल ख़ुद ही अपनी पुरानी गलतियों पे रोई थी,
आज फिर से प्यार के लिए वहीं पागल दीवाना ढूँढती हैं,
सूना है सब जान दे रहे है उसकी कातिलाना नशीली आँखों पे,
मगर वो अपने शहर में मेरे जैसा दीवाना ढूंढती है,
अब तो उससे मिल आ "एज़ाज़"
उसे अपशोष बहुत है तेरे खोने का,
अब तो बस वो रोने के बहाने ढूँढती हैं,
मिलने जाव तो उनकी आँखों को यूँ ना देखना ’एज़ाज़’,
नशीली तीर हैं, निशाने ढूँढती है,


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