अलग बैठा हूँ...!



दीन से दूर, न मज़हब से अलग बैठा हूँ 

तेरी दहलीज़ पे हूँ या रब, पर सब से अलग बैठा हूँ...!


ढंग की बात कहे कोई, तो बोलूँ मैं भी 

मतलबी हूँ, किसी मतलब से अलग बैठा हूँ...!


दुनियांबी ज़िन्दगी में हासिल न हुआ चैन मुझे 

मुतमइन दिल है बहुत, इसलिए अलग बैठा हूँ...!


लोगों से दूर, मगर मेरे रब की निगाहों के करीब 

महफ़िल-ए-यार में इस ढंग से अलग बैठा हूँ...!


यही मस्लक है मेरा , और यही मेरा मक़ाम 

आज तक ख़्वाहिश-ए-मन से अलग बैठा हूँ...!


उम्र करता हूँ बसर गोशा-ए-तन्हाई में 

जब से ज़िन्दगी से रूठ गए, तब से अलग बैठा हूँ...!


मेरा अंदाज़ 'एज़ाज़' अहल-ए-जहाँ से है जुदा 

सब में शामिल हूँ, मगर सब से अलग बैठा हूँ...!


अल्फाज़-ऐ-एजाज़


Comments