एै मालिक मेरे रब,
“ज़िन्दगी दी है तो जीने का हुनर भी देना,
पाँव बख्शें है तो तौफ़ीक-ए –सफ़र भी देना,
गुफ्तुगू तू ने सिखाई है की मै गूंगा था,
अब मै बोलूँगा तो बातों में असर भी देना,
मै तो अपने देश के गरीबो के लिए भला सोच कर ख़ुश हूँ लेकिन,
बहुत जल्द उस सोच को पूरा करने का हिमत भी देना,
और हमारे देश के गरीबो के अगली नस्लें न भटके,
उन्हें नेक इल्म और घर भी देना,
अमीरीऔर गरीबी का यह खेल सदियों से चली आ रही है,
अमीरों को बंगला जो दिया है गरीबो को सर छुपाने के लिए घर भी देना,
अल्फाज़-ऐ-एज़ाज़

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