हर बार मेरे सामने आती रही हो तुम
हर बार तुम से मिल के बिछड़ता रहा हूँ मैं
तुम कौन हो ये ख़ुद भी नहीं जानती हो तुम
मैं कौन हूँ ये ख़ुद भी नहीं जानता हूँ मैं
तुम मुझ को जान कर ही पड़ी हो अज़ाब में
और इस तरह ख़ुद अपनी सज़ा बन गई हो तुम
तुम जिस ज़मीन पर हो मैं उसका ख़ुदा नहीं
तुम अपनी जिंदगी का खुद किराएदार ही रहो
बेजान हो गई हो बहुत ज़िंदगी से तुम
जब बस में कुछ नहीं है तो बेजान ही रहो
तुम को मेरे शयारे ज़िन्दगी से क्या ग़रज़
तुम अपने हक़ में बीच की दीवार ही रहो
मैं इब्तिदा-ए-इश्क़ से बे-मेहर ही रहा
तुम इंतिहा-ए-इश्क़ का मेआ'र ही रहो
रंगों की खूबसूरती तुमसे है ये सुन कर ख़ुशी हुई
हर रंग हर अदा में भी पुरस्कार ही रहो
मैंने ये कब कहा था मोहब्बत में है नजात
मैं ने ये कब कहा था वफ़ादार ही रहो
अपनी ज़िन्दगी-ऐ-शुकुन लुटा कर मिरे लिए
तुम अपनी ज़िन्दगी-ऐ-बाजार में नादान ही रहो
जब मैं तुम्हें नशाये-ए-मोहब्बत न दे सका
ग़म में कभी सुकून-ए-रिफ़ाक़त न दे सका
जब मेरे सब चराग़-ए-तमन्ना हवा के हैं
जब मेरे सारे ख़्वाब किसी बेवफ़ा के हैं
फिर मुझ को चाहने का तुम्हें कोई हक़ नहीं
तन्हा कराहने का तुम्हें कोई हक़ नहीं...

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