भले दिनों की बात थी,
भली सी एक शक्ल थी,
वो हुस्न से कमाल थी,
ना देखने में आम थी,
वो चले तो तारों सी चमक लगे,
वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे,
फ़जा का रंग रूप थी,
वो गर्मियों की छांव थी,
वो सर्दियों की धूप थी,
ना ऐसी खुश लिबासियां,
कि सादगी हया करे,
ना इतनी साज परोसी,
की आईना हया करे,
ना दोस्ती में वो कम,
ना इस कदर सुपुर्दगी,
कि कोई ना शाजिश करें,
ना आशिकी ज़ुनून की,
कि ज़िन्दगी अजाब हो,
ना इस कदर कठोरपन,
कि दोस्ती खराब हो,

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