रोकना पड़ेगा आँखों से समंदर तुझको...

 


मीस अंनु, रोकना पड़ेगा आँखों से समुन्दर तुझको, 

तू कभी मेरे बारे मे सोच तो सही मुझको, 


इसमे आवारा मिज़ाजी का कोई दख़्ल नहीं, 

तुम्हारी धोकाधड़ी याद बहुत आती है मुझको,

  

एक टूटी हुई कश्ती का मुसाफ़िर हूँ मैं, 

हाँ निगल जाएगा एक रोज़ समुन्दर मुझको, 


इससे बढ़कर मेरी तौहीन -ए-अना क्या होगी, 

अब बेवफा भी समझते हैं बेवफा  मुझको, 


ज़ख़्म चेहरे पे, लहू आँखों में, सीना छलनी,

ज़िन्दगी अब तो ओढ़ा दे कोई चादर मुझको, 


मेरी आँखों को वो बीनाई अता कर मौला, 

एक आँसू भी नज़र आए समुन्दर मुझको, 


कोई इस बात को माने कि न माने लेकिन, 

चाँद लगता है तेरे माथे का झूमर मुझको, 


दुख तो ये है मेरा दुश्मन ही नहीं है कोई

ये मेरे दोस्त हैं कहते हैं जो बाबर मुझको, 


मुझसे आँगन का अँधेरा भी नहीं मिट पाया, 

और दुनिया है कि कहती है ‘नूर-ऐ-एज़ाज़ ’ मुझको...



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