मै आईना हूँ मुझे टूटने की आदत है...




चलो ये इश्क़ नहीं तुम्हारे चाहने का तरीका  है, 

कि क्या करें तुम्हे तो मुझे धोका देने  की आदत है, 


तू अपनी शीशा-गरी का हुनर न कर ज़ाया, 

मैं आईना हूँ मुझे टूटने की आदत है, 


मैं क्या कहूँ के मुझे सब्र क्यूँ नहीं आता

मैं क्या करूँ के तुझे देखने की जो आदत है, 


तेरे नसीब में ऐ मेरे दिल सदा ही मायूसी रही, 

न वो इश्क़ की और न तुझे उसे भूलने  की आदत है, 


मेरे ज़िन्दगी मे वहीं है, मेरे दर्द के कारण,

कि उसको नींद और मुझे रात भर जागने की आदत है, 


ये मुश्क़िलें हों तो कैसे रास्ते तय हों, 

मैं हूँ बेवकूफ़ मुझे उसे सोचने की आदत है, 


ये यादें तन्हाई  कब तक "एज़ाज़"

न याद कर उसे जिसे भूलने की आदत है,



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