तू पास हो या ना हो दिल बेक़रार अपना है,
की अब हमको तेरा नहीं इंतज़ार अपना है,
मिले कोई भी तेरा ज़िक्र छेड़ देता था,
की जैसे सारा जहाँ का प्यार अपना है,
वो दूर हो तो बजा तर्क-ए-दोस्ती का ख़याल,
वो सामने हो तो कब इख़्तियार अपना है,
ज़माने भर के दुखों को लगा लिया दिल से ऐै एज़ाज़,
ये सोच के की इस ज़माने मे सारे लोग अपना है,
"एज़ाज़" राहत-ऐ-ज़िन्दगी भी तो नहीं थी उस वक़्त,
जिस वक़्त सोचते थे की वो सिर्फ प्यार अपना है...


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