आँखों से आंसू गिरा कर मै सोचता रहा...

 


जब मेरे ज़ेहन-ऐ-तसौउर मे धन न था,

तो इस तरह खूद से खूद को लूटने का डर न था


शहर में जंगलो की तरह का सफर न था

इंसान की सूरत मे कोई जानवर न था,


 आँखो से आंसू गिरा कर मै सोचता रहा, 

इतना तो अपने आप से मै बेखबर न था, 


इस बार खुद को गौर से देखा तो ये मिला

मै सिर्फ एक शरीर था, मेरे शरीर मे रूह न था,


होठ कापति रही "एज़ाज़"

मगर एक बात का भी दिल पे कोई असर न था,

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