जब मेरे ज़ेहन-ऐ-तसौउर मे धन न था,
तो इस तरह खूद से खूद को लूटने का डर न था
शहर में जंगलो की तरह का सफर न था
इंसान की सूरत मे कोई जानवर न था,
आँखो से आंसू गिरा कर मै सोचता रहा,
इतना तो अपने आप से मै बेखबर न था,
इस बार खुद को गौर से देखा तो ये मिला
मै सिर्फ एक शरीर था, मेरे शरीर मे रूह न था,
होठ कापति रही "एज़ाज़"
मगर एक बात का भी दिल पे कोई असर न था,

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