तन्हाई कह रही है, दिलो दिमाग़ में क्या,
वो फिर से आ रही है, मेरे ख्याल में क्या,
किसी को अब गलत करने से कोई रोकता भी नहीं,
यही होता है, समाज में क्या,
बोलते क्यों नहीं, सच के हक़ में
छाले पड़ गये, ज़बान में क्या,
मेरी हर गजल, कविता, नज्म, बे-असर ही रही
नुक़्स है कुछ, मेरे बयान में क्या
वो मिले तो ये, पूछना है मुझे
अब भी हूँ मैं तेरी, ज़ेहन-ऐ-ख्याल में क्या,
वर्षो से ही, दिल-ऐ-मकान है बंद,
नहीं नुकसान तक, दिल-ऐ-मकान में क्या,
यूं जो सोचता है,अपनी सोच को तू
कोई रहती है, सोचे-ऐ-ख्याल में क्या,
ये मुझे चैन, क्यूँ नहीं पड़ता,
इक ही लड़की थी, जहान में क्या,


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