बीमार है...

 


इस नए माहौल में जो भी जिया बीमार है, 

जिस किसी से भी नया परिचय किया बीमार है,


हंस रही है कांच के कपडे पहनकर बिजलियाँ,

उसको क्या मालूम मिट्टी का दिया बीमार है, 


आज लफ्जो की महफ़िल में एक ये ही शोर था,

सुर्ख है क्यों सुर्खियाँ जब हाशियाँ बीमार है, 


काम में आए नहीं धागे, सुई, मरहम, दवा, 

आज भी जिस ज़ख्म को हमने सिया बीमार है,


रोग कुछ ऐसे मिले है शहर की झीलों को, 

अब इनका पानी जिस किसी ने भी पिया बीमार है, 


एक भी उम्मीद की किरण इधर आती नहीं, 

हो न हो सूरज भी बीमार है, 


कल ग़ज़ल में प्यार के ही अल्फाजो का माहौल था, 

आज लेकिन प्यार का ही अल्फाज  बीमार है,

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