सामने उसके कभी हमने खूद को जाहिर नहीं किया,
दिल ने चाहा भी मगर होंटों ने जुंबिश नहीं किया,
जिस क़दर उससे त’अल्लुक़ था उसके रास्ते मे चला आता था,
उसकी क्या थी भूल की जिसकी कभी मैंने ख़्वाहिश नहीं किया,
ये भी क्या कम है के दोनों का भरम क़ायम है,
उसने बख़्शिश नहीं की हमने गुज़ारिश नहीं किया,
हम तो दुख ओढ के अपने ज़िन्दगी में खूश रहते हैं,
हमने कभी किसी से अपने ज़ख़्मों की नुमाइश नहीं किया,
ऐ मेरे अब्रे करम देख ये मेरे बिराना दिल को,
क्यों मेरे दिल पे कभी बारिश नहीं किया,
वो हमें भूल गई हो तो अजब क्या है एज़ाज़,
हम ने भी मेल-मुलाक़ात की कोशिश नहीं किया...


Nice
ReplyDeleteTrue
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