जगती रात अकेली सी लगे
जिंदगी एक पहेली सी लगे
ज़िन्दगी का रंग मंच और
ये लोग जुवारी सा लगे,
यहाँ मतलब के है लोग,
ये दुनिया झूठी फरेबी सी लगे,
दिन सुनी हवेली सी लगे,
हमकलामी आखिर किस्से करे सब के सब मतलबी सा लगे
खुश हूँ, यूँ कबिताए लिख कर,
वरना शायरी तो तेरे इश्क़ जैसी झूठी फरेबी सा लगे,
अल्फाज़-ऐ-एज़ाज़
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