बेरोजगारी



पैसा तो नहीं है मगर मेरे यार बहुत है, 

पर क्या करूँ मेरा दिल खुद्दार बहुत है, 


इस खेल में हाँ की भी ज़रूरत नहीं होती, 

लहजे में लचक हो तो फिर इंकार बहुत है, 


ज़िन्दगी के सफर मे कही रुकना भी चाहुँ थक कर,

पर ऐ वक़्त तेरे पाँव की रफ़्तार बहुत है, 


नेकी की कमाई का मजा ही कूछ और है, 

वरना कमीनो के लिए लोगों का डर बहुत है, 


मुश्किल है मेरे सोच की उलझने अपनी ज़िन्दगी का, 

ऐ ज़िन्दगी तुझे जीने के लिए  यहाँ इम्तिहान बहुत है, 


अब दर्द उठा है तो ग़ज़ल भी है ज़रूरी, 

पहले भी हुआ करता था इस बार बहुत है,

अल्फाज़-ऐ-एज़ाज़ 

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