सर से चादर ना हटे पाव भी चादर मे रहे...



कास मुझसे कोई कहे की लड़की के  चक्कर में ना रहे, 

दौर अच्छा नहीं बेहतर है कि एज़ाज़ आप घर में रहे, 


जब तराशे गए तब उस लड़की की  हक़ीक़त उभरी, 

वरना कुछ दो दिनों से हम युही एक अजनबी के चक्कर मे ही रहे, 


दूरियाँ कुछ ऐसे बनाये उससे कि दुनिया न देखे न सुने, 

समझ ना पाए वो भी जो मेरे साथ साथ रहे, 


वो खुसबू है उसको छूने की ह़ाजत भी नहीं, 

इतना काफ़ी है की वो मेरे गजल के हर एक लफ्जो में रहे, 


उसकी मुस्कुराहटे, बाते और मुझे उससे लगाव लिख रहा हूँ, 

यूँ ही बेकार में क्यों दर्द मेरे सर में रहे, 


खुदा ज़िन्दगी इतना अगर दे तो ये काफ़ी है ’एज़ाज़ ’

सर से चादर न हटे पाँव भी चादर में रहे,



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