नेकियों और गुनाहो का रफ़्तार....



हमारी हर सोच, हर इक अल्फाज़ गलत होती जा रही है

इलाही, क्या मिरी नेकियों का सिलसिला कम होती जा रही है!


ज़माना हर रोज ज़ुनून-ए-रफ्तार से तरक्क़ी होती  जा रही है,

मगर मै एज़ाज़ आशिक-ऐ-हुस्न हर रोज गुनहगार होते जा रहे है!


अब जी नहीं चाहता, खूद को समझायें, समझाते रहे,

बहुत ज्यादा हुस्न-ऐ-मोहब्बत होती जा रही है!


खूद का ख्याल रफ़्ता-रफ़्ता इक लम्हा बनाता जा रहा है

वो इक सक्ल-ऐ-नूर जो मुझी में है ,हकीकत होती जा रही है!


वो रह-रहकर गले मिल-मिलके रुख़सत होती जा रही है

मिरी आँखों से या रब ! रौशनी कम होती जा रही है!


दिल-ऐ-ज़िगर गम हमारी रफ्ता रफ्ता बढ़ती जा रही है,

झुकी पड़ी है निगाहें मेरी, और आंख भरती जा रही है!



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