हमारी हर सोच, हर इक अल्फाज़ गलत होती जा रही है
इलाही, क्या मिरी नेकियों का सिलसिला कम होती जा रही है!
ज़माना हर रोज ज़ुनून-ए-रफ्तार से तरक्क़ी होती जा रही है,
मगर मै एज़ाज़ आशिक-ऐ-हुस्न हर रोज गुनहगार होते जा रहे है!
अब जी नहीं चाहता, खूद को समझायें, समझाते रहे,
बहुत ज्यादा हुस्न-ऐ-मोहब्बत होती जा रही है!
खूद का ख्याल रफ़्ता-रफ़्ता इक लम्हा बनाता जा रहा है
वो इक सक्ल-ऐ-नूर जो मुझी में है ,हकीकत होती जा रही है!
वो रह-रहकर गले मिल-मिलके रुख़सत होती जा रही है
मिरी आँखों से या रब ! रौशनी कम होती जा रही है!
दिल-ऐ-ज़िगर गम हमारी रफ्ता रफ्ता बढ़ती जा रही है,
झुकी पड़ी है निगाहें मेरी, और आंख भरती जा रही है!


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