तजुर्ब-ऐ-ज़िन्दगी मे क्या क्या मुकाम आ रहे है...



तजुर्बे ज़िन्दगी में क्या-क्या मुक़ाम आ रहे हैं,

कि मंज़िल पे नहीं हैं और फिर भी ठहरे जा रहे हैं!


ये कह-कह के हम दिल को बहला रहे हैं

वो लोग मंजिल पा लिए अब हम पाने जा रहे है!


हम ख़ुद ही नादान बे-काबिल हुए जा रहे हैं

ख़ुदा जाने क्या क्या ख़याल आ रहे हैं!


हमारे ही ज़िन्दगी से सब मज़े  ले रहे है,

क्यों की हजारों धोके जो दुनियां से  हम खा रहे हैं!


नफरत करने वालों को क्या हो गया है

हम तो वफ़ा-ऐ-प्यार करके भी शरमा रहे हैं!

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