मिजाज सारे बदल गए...



ये ज़ुनुन-ऐ-इश्क़ था कौनसा, कि मिज़ाज सारे बदल गए

मैं इसे कहूँ भी तो क्या कहूँ, मेरे हाथ फूल से जल गए,


तेरी बेरूख़ी की वजह से, कई शेर यूँ  अ़ता हुए

की ज़बाँ पे आने से पहले मेरी आँख से ही छलक गए,


तेरा प्यार ही अ़जीब था, या अलग तुम्हारा उसूल था,

कभी बिना देख के बहक गए, कभी देख के संभल गए


सुनो ज़िन्दगी की ये शाम है ,यहाँ सिर्फ़ अपनों का काम है

जो चिराग थे वक़्त पे जल उठे, जो सूरज थे वो ढल गए,


कई लोग ऐसे मिले मुझे, जिन्हें मैं कभी न समझ सका

बड़ी अच्छाई की बात की, बड़ी सादगी से फिसल गए,


ज़रा ऐसा करदे तू ऐ ख़ुदा, कि ज़बाँ वो मेरी समझ सकें

वो जो शेर, जो शेर उनके लिए कहे वहीं उनके सर से निकल गए...

अल्फाज़-ऐ-एज़ाज़ 

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