उमीद-ऐ-ज़िन्दगी कब तक,
ज़िन्दगी का दर्द-ऐ-सर कब तक,
ये माना सब्र करते हैं सफल होने में मगर कब तक,
एक हद होती है खूद को खूद से समझने, दिल बहलाने की,
याद आयें ग़रीब, खूद को लायक बनाऊ कब तक,
मना सोच-ऐ-ज़िन्दगी सच नहीं हो सकतीं,
तकदीर-ऐ-ज़िन्दगी के सहारे बैठूं, मगर कब तक,
हा, नहीं होता वक़्त-ऐ-कद्र हमसे,
वक़्त को वक़्त मे सोचते रहु वक़्त तक, मगर कब तक,
खुदा की इनायत की करम है मुझपे
की लुत्फ़ उठा रहा हूँ,
मगर ये लुफ्त-ऐ ज़िन्दगी कब तक,
करता रहु गुनाहे ज़िगर कब तक,
किसी का हुस्न रुसवा हो जाता है पर्दे ही पर्दे में,
न बदले हम, न ज़माना, आख़िरकार हवसी नज़र कब तक...

Nice 👍
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