समझ बैठे थे हम....?



चंद लोगो से मिल कर खूद को समझदार समझ बैठे थे हम,

अपनी इश्क़-ऐ-ज़िन्दगी को क्या समझ बैठे थे हम,


रफ़्ता रफ़्ता ग़ैर अपनी ही नज़र में हो गये,

वाह रे ग़फ़्लत तुझे अपना समझ बैठे थे हम,


तौफ़ीक़-ऐ-होश भी नहीं,मेरे दिल को आ सकी,

झूठे इश्क़ में अपने को दीवाना बना  बैठे थे हम,


अब भूल बैठी है मेरी निगाहें नजर, तेरी नूरे सक्ल,

तुझको को अपनी सुकून-ऐ-दिल समझ बैठे थे हम,


तेरी झूठे इश्क़ को मेरे सच्चे इश्क़ ने  समझा नहीं,

और क्या क्या सपने सजा बैठे थे हम,...

Comments

Post a Comment

अपने बहुमूल्य विचार हमसे साझा करें। ...