मज़हबों का हिसाब बाद में कर लेंगे 

पहेले साबित तो कर ले की इन्सान है हम...!


चाहे आलिम ही हो तुम, किसी आला धर्म का...!

अगर इंसान न बन सके तो ऐसी ज़िन्दगी पे एक लानत हैं हम...!


ये वक़्त नहीं झगड़ा व फिरका परस्ती का...!

इंसानियत खतरे में हैं आओ उसे बचा ले हम...!


तैयार है हम तेरे धर्म में आने के लिए कभी भी...!

पर क्या यक़ीन हैं तुम्हे ..? कि इंसान बन जायेंगे आप और हम...!


अब तक ज़िंदा नहीं हुए है सब,

वर्ना इंसानियत का परचम लहराते आप और हम...!!


*****अल्फाज़-ऐ-एज़ाज़*****

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