तेरे जुबां पर फिर से पहरा हो न जाए,
तरे ख्याल डरा सहमा सा हो न जाए..!
तुम्हे, हम दोस्त अपना मानते हैं,
कही तुम फिर दुश्मन हमारा हो न जाए.!
तुम्हे बहला दिया है झूठ कहकर,
कहीं सच का खुलासा हो न जाए..!
भरोसा तुम पे कर के सोचते हैं,
कहीं धोखा दुबारा हो न जाए..!
जरा सी बाँध दो उम्मीद हमारी,
हमें फिर से निराशा हो न जाए..!
उजागर कर कर रहा हूँ पिछली बात सारा,
खड़ा फिर से तमाशा हो न जाए..!
यही परेशानी हमें सत्ता रही है,
हमें फिर से प्यार, तुम से हो न जाए..!
अल्फाज़-ऐ-एज़ाज़...

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