रह गए हैं दोस्त केवल नाम के।

दुख मुसीबत में नहीं कुछ काम के।


लौटकर आए परिंदे पेड़ पर।

घिर गए हैं फिर अंधेरे शाम के।


काम से फुरसत मिलेगी क्या हमें।

दिन अभी आए कहाँ आराम के।


पास में जिनके नहीं ईमान है।

हो गए वो लोग कौड़ी दाम के।


चाहते ऐसा नहीं थे जो कभी।

लोग पहुँचे पास उस अंजाम के।


झूठ सुख के आश्वासन थे दिए।

बढ़ गए दुख और भी आवाम के।


खोट कश्यप खूब थी जिनमें भरी।

वे हुए हकदार क्यों ईनाम के।


*****अल्फाज़-ऐ-एज़ाज़ *****

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