अंधेरी रात में दिल-ए-चिराग जला के बैठा हूं 

कहीं से तेरे आने की उम्मीद लगा के बैठा हूं 


अरमानों के दीए जलाकर तेरी राह में 

चमन-ए-मोहब्बत के बाग लगा कर बैठा हूं 


तू आए और मुकम्मल हो सब ख्वाब मेरे 

हर ख्वाब में ये ख्वाब सजा के बैठा हूं 


ऐसा ना हो तू आए और चुपके से निकल जाए 

मैं हर आहट पर गौर से कान लगा के बैठा हूं 


आज तू आएगी तो सब अरमा बयां करूंगा अपने 

इसी चाह में दिल के सब अरमान बिछा कर बैठा हूं 


शाम ढल गई है अब तो दीदार हो मेरे चांद का 

इबादत करूं , फिर जरा कुछ खा लूं  

देख तू मेरा पगलपन .….

मैं बिन रोजों के मौसम में भी रोजे बना कर बैठा हूं


अंधेरी रात में दिल-ए-चिराग जला के बैठा हूं 

कहीं से तेरे आने की उम्मीद लगा के बैठा हूं ।।

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