मज़हब-ए-इश्क़ की हर रस्म कड़ी होती है,


हर कदम पर कोई दीवार खड़ी होती है


इश्क़ आज़ाद है, हिंदू ना मुसलमान है इश्क़,


आप ही धमर् है और आप ही ईमान है इश्क़


जिससे आगाह नही शेख-ओ-बरहामन दोनो,


उस हक़ीक़त का गरजता हुआ ऐलान है इश्क़


इश्क़ ना पुच्छे दीन धरम नू, इश्क़ ना पुच्छे जाताँ


इश्क़ दे हाथों गरम लहू विच, डुबियां लख बराताँ   


के ये इश्क़ इश्क़ है इश्क़ इश्क़,  ये इश्क़ इश्क़ है इश्क़ इश्क़

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