नई, पुरानी दिल की आरज़ू नहीं होते...!
टूटे हुये रिश्तों पर... रफ़ू नहीं होते...!
बिख़र जाने के बाद समेटता हूँ ख़ुद को...!
आज़ कल कोई किसी का अपना नहीं होते...!
पाकीज़गी में खूद को अऊवल समझिये एज़ाज़...!
क्यूँकी आंखों के आंसुओं से वज़ू नहीं होते...!
कोई बतलाये मुझे, मैं किस हालत में हूँ...!
हमसे अब इस हाल में गुफ़्तगू नहीं होते...!
ज़रूरतें ज़िन्दगी की परेशान किये हैं ,,एज़ाज़ ,,...!
वरना किसी को किसी की आरज़ू नहीं होते..!
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