काम करता हूँ  दर्द-ए-सर वाला 

लोग कहते मुझे जिगर वाला 

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कौन परखेगा मेरा इल्म यहाँ 

है कोई  पारखी नज़र  वाला

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बाज़ को रोकनी पड़ी है उड़ान 

उड़ गया पंछी  टूटे पर वाला 

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मस्त है इक फ़क़ीर , हैरत है 

रो रहा है ज़मीन-ओ-ज़र वाला 

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लीप गोबर को दर पे ख़ुश बेज़र 

ग़मज़दा है तो संग-ए-दर वाला 

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इल्म रखता हूँ अश्क पोंछने का 

कोई आये  तो चश्म-ए-तर वाला 

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बे-समर पेड़  सिर्फ़ उछलेगा 

और झुकेगा लदे समर वाला 

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होसलेवाला छू ही लेता  फ़लक 

ख़ाक छाने अगर मगर वाला 

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मैं   ग़ज़ल को 'तुरंत' नज़्म करूँ 

है कोई  और इस  हुनर वाला

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