क़यामत



उसकी आँखों से, छलकती शराब देखी है,

देखने वालों की, तबियत खराब देखी है।


जिसके शैरो पर, वाह-वाह करते थे सभी

उस गज़ल की आज, पूरी किताब देखी है।


ऐसा नहीं कि हमने, खूबसूरती नहीं देखी,

पर आज जो देखी है, बे-हिसाब देखी है।


जन्नत में होगी या नहीं, यह तो पता नहीं

जमीं पर आज कोई हूर, बेनकाब देखी है।


मौत को देखने वाला, कोई शायद ही मिले,

हमने तो रूबरू, कयामत जनाब देखी है।


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