हमारी बात किसी को बहकाती नहीं है...!

और किसी के मन को भरमाती नहीं है...!



नहीं तुम लौट के आओगी फिर से...!

समझ क्यों बात ये मुझे आती नही है...!



करो मत रोशनी की आस उस से, एज़ाज़...!

अभी उस दीप में रौशनी  नहीं है...!



लोग खूद की जाल में फँसते खूद हैं ...!

ये मकड़ी तो कहीं जाती नहीं है...!



अब तुम्हारी याद में क्यों खोए हम...!

ये तसल्ली दिल को बहलाती नहीं है...!



फूल जब तक  खिल नहीं जाती ...!

घर तब तक वो महकाती नहीं है...!

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