ज़िन्दगी  में  ज़ेब  ख़ाली हो गई।

घर, दीवारें, छत सवाली हो गई।


ख़ुद  में जब बेरोजगारी आ गई।

हर  नसीहत  ख़ूब  गाली हो गई।


आइने  में  रूप   दिखता  है नहीं।

सूरतें कुछ  ख़ास काली  हो  गई।


चुटकुलों  को दौर ऐसा चल गया।

अब अदब तहज़ीब ताली हो गई।


थी अमावस ज़िन्दगी अपनी यहाँ।

तुम मिले आज तो फ़िर दिवाली हो गई।


दस हजारी नौकरी में अब 'एज़ाज़।

बस लबों पर कुछ  जुगाली हो गई।


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