दुआएं दीजिए मैं लाजवाब हो जाऊँ
तुम्हारे शहर का इक इंतिख़ाब हो जाऊँ
मुझे संवार दे ऐसा कि रहती दुनिया तक
हर एक शख़्स का हाज़िर जवाब हो जाऊँ
मेरे अजीज़-ओ-अकारिब हों या के दोस्त मेरे
जो मुझ को खोलने बैठें किताब हो जाऊँ
मेरे नसीब मुझे कुछ न दे, दुआएँ दे
किसी ग़रीब की आंखों का ख़्वाब हो जाऊँ
तुम्हारे शहर में आ कर मैं अजनबी तो नहीं
दो-चार लफ्ज़ निकालूं, हिसाब हो जाऊँ
वो रहनुमा भी है, हमदर्द भी है, आशिक़ भी
हो उसकी नज़र-ए-करम कामयाब हो जाऊँ
जो राह-ए-इश्क़ में तेरी बहोत अंधेरा है
हमारे साथ चलो आफ़ताब हो जाऊँ
हमारी राह में कांटे ही कांटे हैं 'एज़ाज़'
ख़ुदा करे मैं महेकता गुलाब हो जाऊँ
एज़ाज़
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