क्या भला होगा मेरा हर दिन सवेरों से
मैं अभी निकला नहीं मन के अँधेरों से।
कोई दुनिया का नहीं घेरा दिखे बाहर
हूँ घिरा मैं आजतक अपने ही घेरों से।
तीर तो पहला चला अपनों की जानिब से
क्या शिक़ायत अब करूँ कुछ भी मैं ग़ैरों से।
वो कभी ख़ुशहालियां लेकर के आएंगे
तुम लगा उम्मीद बैठे हो लुटेरों से।
कुछ कमाने, नाम भी .करने की सोचेंगे
गर मिली फुरसत मेरे सोचो के फेरों से।
क्या हुयीं महलों की वो रंगीं जवां रातें
पूछिए जाकर ज़रा मलवे के ढेरों से।

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