चार पल प्यार बेहिसाब दे गया कोई...!

अपना बन एक हसीन ख्वाब दे गया कोई...!!


उसे मालूम था पढ़ना पसंद है मुझको...!

दर्द-ओ-गम की मुझे किताब दे गया कोई...!


उसकी उल्फत की बेचैनी थी जिगर में मेरे...!

पीने को जहर की शराब दे गया कोई...!!


हम तो अनजान थे रस्म-ओ-रिवाज-ए-दुनिया से...!

बेवफा का मुझे खिताब दे गया कोई...!!


रूह तक जख्मी है जिस्म-ओ-जिगर को तुम छोड़ो...!

मुस्कुराहट का एक हिजाब दे गया कोई...!!


अब कहां हमको जरूरत है शम-ए-खुशियों की...!

गम-ए-उल्फत का यूँ मेहताब दे गया कोई...!


हम थे अनजान शेर-ओ-शायरी से "एज़ाज़"

एक आदत मुझे खराब दे गया कोई...!!

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