पेशानी,रुखसार रातों को चांदनी के लब चूमा करता है

चाँद शब से सुबह तलक पिघला धीमा धीमा करता है


महबूब शराब सा है छूते ही सारा जिस्म नशा करता है

आधी रात जाग जाग कर दिल शराबी हंगामा करता है


पत्थर खा कर भी दिल जेहन लैला को सोचा करता है

हद से आगे बढ़े प्यार फिर पार मजनू सीमा करता है


भंवरा कली पर जो बैठे गुलशन में फूल खिला करता है

सिप में अगर बालू उतर जाये तो मोती जनमा करता है


अजीब शय है इश्क़ जां को दाव पर लगाना पडता है

इश्क़ मे मौत भी आ सकती है मगर कौन बीमा करता है


                          

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