शाम  सा  धुँधलका  मेरे   ज़हन  पर  छाया  है 

कोई  यादें  लेकर मेरी आँखों में उतर  आया है 


ढूंढती  फिर  रहा हूँ अक्स अपना हर दरिया में 

चश्म ए आब में दिखता जो कर गया पराया है 


गुंज रही है ,फिज़ा में मीठी आवाज़ परींदों  की 

लम्हा  ये मगर मुझको एक पल भी ना भाया है 


बना लिया है, तनहाई  को ....अपना हमसफर 

डराता  मुझे  अब.....  हर मजमा का साया है 


इंतजार है आज भी उसके लौट आने का "एज़ाज़ "

दिल को  उसकी जफा का  यकीन ना आया है 

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