बाद उसके किसी से हमने मोहब्बत नही की
जायज निक़ाह कर लिया यानी अय्याशी नही की
शाख से टूट कर हम फूल सीधे मंदिर जा पहुँचे
बीच राह किसीके सेज चढ़ हमने बदमाशी नही की
उस दरिया से निकलकर हम समंदर में जा उतरे
किसी चबूतरे से रुके नही कहि आबपाशी नही की
मौका कभी जरिया ढूंढते रहे के उससे गुफ्तगू हो
घुंघरू टूटकर भी बजते रहे कभी खामोशी नही की
आफताब को कितना भी दबा लो वो उगकर रहता है
हमारे इश्क़ सच्चा है सच ने कभी नुमाइशी नही की
हमने राधा समझ उसको कान्हा सी मोहब्बत की
हम रूह के करागिरोंने बदन पर नक़्क़ाशी नही की
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