लोगों की ख्वाहिशों का शिकार हो गया हूँ
मैं एक कोयले की खदान हो गया हूँ ।
सब मुझमें मुख्तलिफ इक नगीना ढूंढते हैं
इस कशमकश में मुझको दिन-रात खोदते हैं।
जख्मों को जब भी अपने आईने में देखता हूँ
गद्दार मौत को हर बार कोसता हूँ।
अब तो वजूद मेरा पल-पल ही मिट रहा है
मेरी रूह का खजाना बेमोल बिक रहा है।
इतना मैं लुट चुका हूँ खुद से बिछड़ गया हूँ
कोई हमशक़्ल है ज़िंदा मैं तो क़ब्र में गड़ा हूँ।
----एज़ाज़ -----
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