सैकड़ो खेत पास है फिर भी दाने दाने को तरसना पड़ता है
मनचाही मोहब्बत गर ना मिले तो फिर निक़ाह करना पड़ता है
मजबूर जिंदगी की कीचड़ में दिल,तनबदन को धसाना पड़ता है
झूठी ताजगी लिए चेहरे पर जहाँ में कमल सा मुस्कुराना पड़ता है
दीदार को तरसती है आँखे कभी आवाज को मचलना पड़ता है
नामुकम्मल ख़्वाहिश चाँद पाने की फिर सितारें को टूटना पड़ता है
वक्त बित गया तो बीत गया फिर अतीत में जीना मरना पड़ता है
ढहा दिया जो तामीर मकान तो फिर मलबा भी उठाना पड़ता है
लिखना पड़ती है कोई गजल कभी अकेले कुछ सोचना पड़ता है
आवाज होठों से बाहर ना निकले दीप ऐसा भी चीखना पड़ता है
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