सरेआम आखिर कब तक,
लुटती रहेगी बेटी यूं,
कहने को तो देवी-रूपी,
फिर नजरें क्यों जिस्मों पर...!!
गली-गली-घर-घर-असुरक्षा,
छिपती-बचती-घबराती,
किस-किस-की-नजरों को बांचे,
करें भरोसा अब किस पर...!!
दुनिया दिन में पीठ को ठोंके,
रात में चाहे सहलाना,
दिन के उजाले में शाबासी,
चाहे रात में बिस्तर पर...!!
बलात्कार और जिस्म-फरोशी,
खबरे सजी अखबारो पर,
कब तक केवल जिस्म मानकर,
नोचेगे दानव चुन-चुन-कर...!!
बेटी दिवस की महिमा केवल,
सजे ना मंच अखबारों पर,
हर बेटी में जब तक हमको,
बिटिया ना अपनी आऐ नजर...!!!

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