ये आख़री है ज़िन्दगी

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इस जमीं की ज़िन्दगी आख़री है तुम्हारी, 
ये बात कब तू नादान समझेगा, 

तुम समझो या ना समझो, 
बड़ी दुश्वारियाँ होंगी अगर आसान समझेगा, 

किसी भूखे से मत पूछो की 
मोहब्बत किसको कहते हैँ, 
तुम गमछा बिछाओ वो दस्तरखान समझेगा, 

इस ज़माने को पता नहीं क्या हो गया हैँ, 
ज़माने से वफ़ा करो ये बेवफा समझेगा, 

और अपनी ज़िन्दगी के 
खाली पन्नों पे रो रही हो तुम, 
मैंने समझा पढ़ी लिखी हो तुम, 

तुम अपनी ज़ेहन में हमारी बातें तो किया करो, 
ना जाने मेरी बात कौन कब समझेगा... 

क्या कहा ये ज़िन्दगी प्यारी नहीं लगती तुम्हें, 
न जाने कब ये जीवन तुम्हें प्यारा लगेगा... 

अल्फाज़-ऐ-एज़ाज़... 
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