हम ख़ुद ही हुए तबाह वरना
दुनिया को हमारी क्या पड़ी थी
ये ज़ख़्म हैं उन दिनों की यादें
जब तुम से दोस्ती बड़ी थी
जाते तो किधर को तेरे ख्वाहिश
ज़न्जीर-ए-जुनूँ जकड़ी पड़ी थी
ग़म थी कि जैसे दिल में
सुनामी आ पड़ी थी
दिल था कि "एज़ाज़ "
टूट टूट कर बिखर चली थी,
अल्फाज़-ऐ-एज़ाज़

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