साथ रोती थी मेरे साथ हंसा करती थी
वो लड़की जो मेरे दिल में बसा करती थी
मेरी चाहत की तलबगार थी इस दर्जे की
की वो मुसल्ले पे नमाज़ों में दुआ करती थी
एक लम्हे का बिछड़ना भी
गवारा नहीं था उसको
उदासी के साथ मुझे
ख़ुद से जुदा करती थी
मेरे दिल में रहा करती थी धड़कन बनकर
और साये की तरह साथ रहा करती थी
रोग दिल को लगा बैठी थी अंजाने में
मेरी यादे मे डूब जान पसंद करती थी,
बात क़िस्मत की है ‘एज़ाज़’
जुदा हो गए हम,
वरना वो तो अपने हांथो पे
मेरे नाम की मेंहदी लगाया करती थी,
अल्फाज़-ऐ-एज़ाज़

Kon thi .....
ReplyDeleteWt a blog ... very nice.
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