किताबें पढ़ते-पढ़ते खुद
कहानी के जैसा हो गया हूँ मैं,
खुद से बाते कर कर के
खुद में ही खो गया हूँ मै,
ना मेरा नाम है, ना दाम है
बजार-ऐ-दुनिया में ,
सफल लोगों की ज़िन्दगी पढ़ कर
और भी सस्ता हो गया हूँ मैं,
बिता दी एक साल और
मैंने खुद को परखने में ,
शायद, अपनी नफ़्स के
चक्कर में पड़ गया हूँ मैं,
सफलता के चक्कर में
गुनाहों की सवारी नजर नहीं आती,
तारा बनने के चक्कर में
अंधेरा हो गया हूँ मैं,,,
अल्फाज़-ऐ-एज़ाज़...

,,👍
ReplyDelete